Monday , September 16 2019

मिलिए इस “दंबग लेडी” से, हिम्मत और हौंसले की मिसाल है

मेरा जन्म एक रुढ़िवादी मुस्लिम परिवार में हुआ। जब मैं 11 साल की हुई तो देखा कि अम्मी-अब्बू में रोज लड़ाई होती थी। कुछ दिनों में उनका तलाक हो गया।

बाद में अम्मी ने दोबारा शादी का फैसला लिया। यह फैसला हम भाई-बहनों को हैरान करने वाला था। मेरी अम्मी ऐसी शख्स थीं, जो समाज की पांबदियों से बिना डरे जिंदगी के फैसले लेने में माहिर थीं।

अम्मी की शादी में कुछ महीने बाकी थे कि एक दिन वो मेरे छोटे भाई के साथ बाहर गईं। घर से बाहर उस दुनिया में जहां सिर्फ पुरुषों का वर्चस्व था। घर की दहलीज पार करते ही अम्मी को खूब खरी-खोटी सुननी पड़ी थी। आए दिन उनके चरित्र को कठघरे में खड़ा किया जाता था।

हालांकि लोगों की दकियानूसी सोच का अम्मी पर असर नहीं पड़ता था। लेकिन उस दिन अम्मी के साथ छोटा बेटा था। लोगों ने उसको भी भला-बुरा कहना शुरू कर दिया। इस बात ने अम्मी को आपा खोने पर मजबूर कर दिया। घर आते ही उन्होंने खुद को आग के हवाले कर दिया।

अम्मी को खोना हमारे लिए गहरा सदमा था। लेकिन जिंदगी आगे बढ़ने का नाम है। लिहाजा, हमने भी अम्मी के बिना जीना सीख लिया। एक साल बाद अब्बू ने हम दोनों बहनों की शादी कर दी।

तब दहेज के लिए अब्बू के पास ज्यादा पैसे नहीं थे। इसीलिए शादी के बाद से मेरी बहन को दहेज के लिए परेशान किया जाने लगा। कुछ समय में वो गर्भवती हो गई, मगर उसके ससुराल वालों ने दहेज न मिलने के चलते मेरी बहन को जहर खिला दिया और वो भी इस दुनिया को अलविदा कह गई।

यह सुन कर मैं स्तब्ध थी। इतने कम समय में मैंने उन दो करीबियों को खोया था, जिनसे मैं सबसे ज्यादा प्यार करती थी। मुझे लगा जैसे इन दो जिंदगियों के साथ मेरी भी दुनिया खत्म हो गई है। लेकिन तभी मुझे पता चला कि मैं गर्भवती हूं।

लिहाजा मैंने एक बार फिर हिम्मत का दामन थामा और अपने बच्चे की खातिर फिर से जीने का फैसला किया।

कुछ महीने बाद मैंने एक बेटे को जन्म दिया। समाज के लिए तो यह खुशी का पल था, लेकिन इसी के साथ मेरे और मेरे पति के रिश्तों में खटास आनी शुरू हो गई। ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहा। जब मैंने तीसरे बच्चे को जन्म दिया, तो मेरे पति ने हमारी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने का फैसला कर लिया।

मेरे पति को मुझ पर प्यार सिर्फ रात के वक्त ही आता था। एक रात ऐसा ही हुआ, उसने अपना मकसद पूरा करने के बाद मुझसे कहा, “तलाक…तलाक…तलाक”

बस अब मुझे अपने तीन छोटे-छोटे बच्चों के साथ घर से निकल जाना था। यह वाकई एक मुश्किल दौर था। उस वक्त लगा कि अम्मी कितनी बहादुर थीं।

बहरहाल घर छूटा पर हिम्मत अभी भी बरकरार थी। मैंने मुंबई की सड़कों पर बिरयानी का ठेला लगाना शुरू किया। मगर यह काम महज कुछ दिन ही चल सका। एक दिन BMC (मुंबई नगर पालिका) ने बिरयानी स्टॉल पर धावा बोल कर उसे तोड़ दिया।

मेरे पति एक रिक्शा चालक थे। लिहाजा उम्मीद की कोई किरण न दिखने पर मैंने भी रिक्शा चलाने का फैसला किया।

हालांकि इस काम से मेरी अच्छी खासी कमाई हो जाती थी। लेकिन कई लोग मुझ पर हंसते थे, मेरे बारे में तरह-तरह की बातें किया करते थे और मुझे नीचा दिखाने की हर मुमकिन कोशिश करते थे। दूसरे रिक्शा चालक मेरा इस हद तक मजाक उड़ाते थे कि सवारियों को किराया तक नहीं देने देते थे और उन्हें डांटकर भगा देते थे। मगर मैंने इन सब चीजों को नजरअंदाज कर दिया।

आज मुझे रिक्शा चलाते हुए एक साल हो गया है। मेरी कमाई से घर अच्छे से चल रहा है। मैं अपने बच्चों की हर जरूरत पूरी करने में सक्षम हूं। बहुत जल्द मैं अपने बच्चों के लिए एक कार भी खरीद लूंगी।

जिंदगी में मुझे भले ही कई मुश्किल दौर से गुजरना पड़ा हो, पर मैंने कभी हार नहीं मानी। आज आलम है कि कई लोग मेरे गले लग कर हिम्मत की दाद देते हैं। मेरे लिए तालियां भी बजाते हैं।

मुझे याद है कि एक आदमी जल्दी में मेरे रिक्शे में आकर बैठ गया और उसने बिना मेरी तरफ देखे कहा, “चलो भइया” ,मगर अगले ही पल जब उसकी नजर मुझ पर पड़ी, तो कुछ समय के लिए वो हैरान था। फिर उसने मुझे “दंबग लेडी” कहकर संबोधित किया। जो मैं हकीकत में हूं। साथ ही हर वो औरत “दंबग लेडी” है। शान के साथ अपने दम पर जिंदगी जीने का हौंसला रखती है।

एक औरत कुछ भी कर सकती है। उसे जीने के लिए किसी समाज, परिवार या पति की बेड़ियों में खुद को जकड़ने की जरूरत नहीं है। मैं नहीं चाहती कि कोई और मेरी अम्मी और बहन की तरह अपनी जिंदगी किसी की गुलामी की भेंट चढ़ा दे।

मुझे पता है, मैं आज जो कुछ भी हूं, वो सिर्फ अपनी और अपने बच्चों के लिए नहीं, बल्कि हर उस औरत की आवाज हूं, जो अपने ऊपर हो रहे अत्याचार सह कर भी खामोश है।

Source: Humans of Bombay/Facebook

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *