Sunday , October 13 2019

बदनाम गलियों की नन्हीं परियों को दी जिंदगी, पति खोया पर हिम्मत आज भी बरकरार

मेरे पति भारतीय सेना में तैनात थे। बाद के दिनों में जब हम मुबंई आए तो उन्होंने एक बिजनेस शुरू किया और मैं पेशे से पत्रकार थी।

एक दिन मैं एक सैलेब्रेटी की स्टोरी कवर करने गई। वो सैलेब्रेटी मुंबई के रेड लाइट एरिया में एक कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे थे।

जब मैं वहां पहुंची तो मैंने देखा कि 13-14 साल की एक लड़की मेरे बगल में खड़ी थी। मैंने जब उस लड़की से उसकी मां के बारे में पूछा तो उसने कहा “मैं नेपाल से हूं, मुझे यहां काम कराने के लिए लाया गया था पर यहां लाकर मुझे बेच दिया गया”।

उस छोटी सी बच्ची की बातें सुनकर मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। इससे पहले कि मैं उस बच्ची से कुछ कह पाती, एक आदमी आया और उसने मुझसे वहां से जाने के लिए कहा।

मैंने ये सारी कहानी अपने पति को सुनाई तो उन्होंने पुलिस की मदद लेने की सलाह दी। उस लड़की को वहां से बाहर निकालने के लिए मेरे पति खुद पुलिस को लेकर उस जगह गए जहां वो लड़की मुझे मिली थी।

मेरे पति जब वहां पहुंचे तो वो हैरान रह गए। वहां एक या दो नहीं बल्कि 15 बच्चियां थी, जो उन बदनाम गलियों से छुटकारा पाना चाहतीं थीं। मेरे पति ने पुलिस की मदद से उन सब लड़कियों को वहां से बाहर निकालने में कामयाबी हासिल की और सबको घर ले आए।

उस दिन हमें ये महसूस हुआ कि ऐसी ही न जाने ऐसी कितनी बच्चियों का भविष्य अंधेर में फंसा हुआ है, जिन्हें उजाले में लाने के लिए हमें कुछ करना होगा।

लिहाजा मेरे पति अपना बिजनेस बंदकर उन लड़कियों का भविष्य संवारने में लग गए। साथ ही बाकि लड़कियों को बचाने का काम शुरू किया। हालांकि मैंने पत्रकारिता जारी रखी। जिससे परिवार को मदद मिलती रही और समाज में भी पहचान बनी रहे।

मैंने और मेरे पति ने जो मुहिम शुरू की थी, जाहिर है उसमें मुश्किलें कम नहीं थी। मेरे पति अक्सर मुंबई की बदनाम गलियों में फंसी लड़कियों की तलाश में रहते थे। वो कभी ग्राहक बन कर या कभी सौदागर बनकर उन गलियों में जाते और हर उस गुप्त जगह का पता लगा लेते, जहां लड़कियों को रखा जाता था। फिर वापस आकर हम पुलिस की मदद से उन लड़कियों को बचा लेते थे।

ये सिलसिला लगभग एक साल तक चलता रहा। साल भर में हमने 300 से ज्यादा लड़कियों को वहां से निकाला और उनके रहने, खाने पढ़ने का इंतजाम किया।

मुझे याद है एक बार हम ऐसी ही एक जगह पर नजर रख रहे थे और अगले ही दिन वहां बच्चियों को बचाने का प्लान बना रहे थे। तभी एक खबर आई कि उसी जगह एक औरत ने छत से कूद कर आत्महत्या कर ली और उसकी एक छोटी सी बच्ची अनाथ हो गई। हमने उस बच्ची को गोद लिया। इसके बाद मैं और मेरे पति जितने खुश थे उतना ही सूकून महसूस कर रहे थे कि हमारी वजह से इन नन्हीं जिंदगियों का भविष्य बदल रहा था।

कुछ ही दिन बीते होंगे कि हमे धमकियां मिलने लगी। एक दिन मुझे एक खत मिला और उसमें लिखा था कि या तो तुम लोग हमारे काम का हिस्सा बन जाओ या फिर कब्र में जाने की तैयारी कर लो।

वो खत देख कर जाहिर है मैं डर गई, इसलिए नहीं कि मुझे अपनी मौत से डर लग रहा था बल्कि इसलिए कि मेरे पति उन्हीं गलियों में फिर गए थे।

मैंने खुद को संभाला। मेरे मन ने जरा साहस बांधा ही था कि सामने से एक गाड़ी आते हुए दिखी। मन को थोड़ा संतोष हुआ कि मेरे पति वापस आ गए मतलब सब ठीक है। लेकिन जब वो गाड़ी नजदीक आई तो देखा कि वो पुलिस की गाड़ी थी और उनके पीछे एक गाड़ी और थी जिस पर एक लाश रखी थी। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती पुलिस के एक अधिकारी ने कहा “आपके पति का एक ट्रक से एंक्सिडेंट हो गया, अब वो इस दुनिया में नहीं रहे”।

मुझे समझते देर नहीं लगी यह कोई दुर्घटना नहीं बल्कि एक सोची समझी साजिश थी जिसे अंजाम दे दिया गया था। मैंने साजिश का सच सामने लाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया और इस दुर्घटना कि जांच की मांग की मगर आखिर में कुछ हासिल नहीं हुआ।

अब मेरी उम्मीद अपना दामन छोड़ रही थी और मैं बचावकार्य फाउंडेशन को बंद करने का मन बना चकी थी।

लेकिन वो छोटी सी बच्ची जिसे हमने गोद लिया था, अब वो बड़ी हो गई थी। इस मुश्किल घड़ी में उसने न सिर्फ मुझे संभाला बल्कि मेरी  हिम्मत भी बांधी। उसने मुझे उन सब लड़कियों की याद दिलाई जिनकी जान मैंने और मेरे पति ने मिलकर बचाई थी।

आज हमारे पास 4 आश्रम हैं। यहां हम रेस्क्यू की गई लड़कियों को शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं दिलाने के अलावा उनके बेहतर भविष्य के लिए काउंसलिग भी करते हैं। यहीं नहीं उनमें से कुछ लड़कियां तो अपने करियर में कामयाबी हासिल कर विदेश में बस चुकी हैं।

मुझे अपने पति को खोए हुए 12 साल हो गए हैं। इन 12 सालों में मैंने कई तकलीफों का सामना किया। मैंने बुरे से बुरे लोगों को गंदा से गंदा काम करते हुए देखा लेकिन इन सबके बावजूद मैंने कई लड़कियों को बचाया और उनकी जिंदगी को जीने का हक दिलाने की पूरी कोशिश की।

आज भी मैं अपने पति को महसूस कर सकती हूं। मुझे हर पल ये लगता है कि वो मेरा हाथ थाम कर हमेशा मुझे लड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। वो कहते हैं कि हम लड़ते रहेंगे फिर क्या फर्क पड़ता है कि आगे क्या होगा।

ये स्टोरी ह्यूमंस ऑफ बांबे के पेज से ली गई है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *