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यू टर्न लें क्या 90 के दशक में? मज़ेदार होगा ये सफर बचपन की गलियों का

90’s kid होने के भी अपने अलग ही मायने हैं। बेबाक बचपन था, मनमानियों से भरा हुआ। अल्हड़पंती में कलाकारी होती थी। नाप आते थे नंगे पांव ही गलियां, उन गलियों की शाम भी बड़ी निराली होती थी। 90 का दशक गुज़रते ही मानो एक पूरी दुनिया खत्म हो गई हो। न सिर्फ लोगों के तौर तरीके बदले, बल्कि समय ने एक दुनिया ही बदल कर रख दी।

खुद को 90’s kid कहने में भी गर्व महसूस होता है, क्योंकि ज़िन्दगी तो हमने जी है, एक चुटकी गम और मुठ्ठी भर खुशियों से भरी हुई। चलिए ले चलते हैं आपको पुराने दिनों की ओर, जहां की यादें हम बटोर लाए हैं।

Sweet candy

स्कूल से निकलते ही आंखें बस इधर-उधर घूमती रहती थीं। कहीं वो लाल गमछे वाले चाचा दिख जाएं। अरे! वही, जो लकड़ी की स्टीक पर कभी मुर्गा, तो कभी फूल, कभी घड़ी, कभी त्रिशूल बनाकर देते थे। लाल और हरे रंग की उन मीठी सी designs को हम खींच-खींचकर खाते थे।

मोर के पंख

ये भी एक अजीब ही बेवकूफी थी कि कॉपी में मोर के पंख रखने से विद्या बढ़ती है और मोरपंख को लकी भी माना जाता था। बस फिर क्या था, उठा लाते थे दर्जन भर मोरपंख और सजा देते थे सारी कॉपियां। विद्या बढ़ने का तो पता नहीं, बाल जरूर बढ़ जाते थे।

पेंसिल के छिलके और दूध से रबर बना कभी?

ये तो लगभग सबने एक बार जरूर try किया होगा। रात को दूध में पेंसिल के छिलके डालकर इस उम्मीद में सो जाते थे कि जब सुबह उठेंगे, तो रबर मिलेगा। अगली सुबह उम्मीद पर दूध फिर जाता था और हमारे चेहरों पर उदासी। आजतक कभी पेंसिल के छिलके वाला रबर नहीं मिला।

सभी देशवासी मेरे भाई-बहन हैं, बस एक को छोड़कर

स्कूल की प्रेयर के बाद वाली वो आठ लाइनें, स्कूल बैग से भी भारी लगती थी। जैसे ही वो लाइन आती थी, सभी देशवासी मेरे भाई-बहन हैं, या तो हमारा मुँह बन्द हो जाता था या फिर उसके बाद लगा देते थे “एक को छोड़कर”। उसके बाद पूरी क्लास के लिए फन ज़ोन चालू।

खाने के बाद कुछ करारा हो जाए

स्लेटी खाना हमारे बडे शौक में शुमार था। स्लेटी के पैकेट्स लिखने के लिए कम और खाने के लिए ज्यादा खरीदे जाते थे। सुबह का सस्ता ब्रेकफास्ट, शाम का क्रंची स्नैक्स, और बाकी दिन भर हर दो-दो घण्टे पर होमियोपैथी की दवा की तरह चलता रहता था।

चॉकलेट दो बराबर हिस्सों में बंटी होनी चाहिए

चॉकलेटहो या हाजमोला की गोलियां, एकदम बराबर बंटनी चाहिये, न कम न ज्यादा। उसके लिए चाहे चाकू का सहारा लेना पड़े या दांतों का, सब कर जाएंगे। माँ कहती थी ‘लगता है घर में अब एक तराजू की भी जरूरत है।’

Hey! I’m a complain boy

याद है ये वो complain का  add? फुर्ती सी आ जाती थी देखकर। कुछ बच्चे तो अपने कमरे में इसके पोस्टर लगाते थे, ताकि देखते ही एनर्जी दौड़ जाए शरीर में और फिर शाम को ग्राउंड पर एक बार जरूर बोलते थे “I’m a complain boy” भले ही घर से चीनी वाला दूध पीकर आए हों।

बारिश में कागज वाली वो नाव

बारिश के दिनों में सबसे मजेदार काम होता था कागज की नाव बनाना। सारे दौड़े चले आते थे अपनी-अपनी छोटी और बड़ी नाव लिए। जोर से छपाके मारकर नाव की सवारी हर घर से निकलती थी।

कहां खो गए वो दिन? लौट कर फिर क्यों नहीं आते। बस कल ही की तो बात है न… काश! ये सब वापस ला पाते। बचपन तो आज भी अच्छा निकल रहा है, नए-नए तरीके हैं खुश होने के लेकिन 90’s की यादें महज़ बिताए गए पल नहीं, जिए हुए लम्हें हैं, जो खुश होने के बहाने भी देते हैं और रो पड़ने का कारण भी बन जाते हैं।

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