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ढीग एक्सप्रेस की कॉमनवेल्थ तक की कहानी, कैसे बनीं गोल्डेन गर्ल

हिन्दुस्तान की मिट्टी में कई धुरन्धरों ने जन्म लिया, जो खेल के क्षेत्र में आगे बढ़े। छोटे शहरों से बडे चेहरों का निकलकर आना इण्डिया की पहचान रही है। जितेन्द्र सिंह हों या बबिता फोगट, इन खिलाडियों ने दुनिया भर में जीत के झंडे गाडे हैं।

कुछ ऐसी ही कहानी है असम की हिमा दास की। हिमा को गोल्डेन गर्ल भी कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने बहुत सारे स्वर्ण पदक अपने नाम किए हैं। उनके उपनामों में से एक ढीग एक्सप्रेस भी है।

हिमा आईएएएफ वर्ल्ड अंडर-20 एथलेटिक्स चैम्पियनशिप की 400 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक हासिल करने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं। हिमा ने इस स्पर्धा में 51.46 सेकेंड का समय निकालकर स्वर्ण पदक जीता। उनकी इस जीत के बाद पीएम नरेन्द्र मोदी ने ट्विटर पर ट्वीट करके उन्हें बधाई दी।

अप्रैल 2018 में गोल्ड कोस्ट में खेले गए कॉमनवेल्थ खेल की 400 मीटर स्पर्धा में हिमा दास ने 51.32 सेकेंड में दौड पूरी करते हुए छठवाँ स्थान प्राप्त किया था।

अगर बात करें हिमा के हॉबीज़ की, तो उन्हें कभी दौड में नहीं आना था। हिमा की पहली पसंद फुटबॉल है, उन्हें फिल्में देखना पसन्द है और वह शूटिंग भी करती हैं।

व्यक्तिगत जीवन

हिमा का जन्म असम के नगाँव जिले के कांधूलिमारी गाँव में हुआ। उनके पिता रंजीत दास और माता जोनाली दास हैं। उनकी धान की खेती है। हिमा चार भाई-बहनों से सबसे छोटी हैं। हिमा स्कूल में लडकों के साथ फुटबाल खेलती थीं। वह अपना करिअर फुटबाल में देख रही थीं।

नवोदय स्कूल के पी.टी. टीचर शमशुल हक के सलाह पर हिमा दास ने दौड़ना शुरू किया। फिर जिला स्तरीय प्रतियोगिता में चयनित हुईं और दो स्वर्ण पदक जीते।

जिला स्तरीय प्रतियोगिता के दौरान ही उन पर ‘स्पोर्ट्स एण्ड यूथ वेलफेयर’ के निपॉन दास की नज़र पड़ी। निपॉन का कहना था कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में इतनी कम उम्र में किसी में इतनी प्रतिभा नहीं देखी। हिमा ने सबसे सस्ते स्पाइक्स पहन रखे हैं और वह 100 और 200 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीत जाती हैं। इसके बाद से निपॉन ने हिमा को गुवाहाटी ले जाने का मन बना लिया। वो कहते थे कि उनके पास वहां एथलेटिक्स में सुनहरा भविष्‍य है। उन्होंने हिमा के माता-पिता से गुवाहाटी जाने की सिफारिश की, जो उनके गांव से 140 किमी दूर था। पहले दोनों ने मना कर दिया, लेकिन काफी समझाने के बाद में वो मान गए।

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